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अहंकार का अंत और बांकीपुर का संदेश: आनंद सिंह

By Goutam

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आनंद सिंह

जनसंवाद, जमशेदपुर। प्रशांत किशोर की जीत यह बताती है कि किसी भी दल को न तो वोटरों को अपना गुलाम समझना चाहिए और न ही रावण सरीखा अहंकार पालने की जुर्रत करनी चाहिए। अब परंपरागत सीटों का कांसेप्ट खत्म हो रहा है और जो जनता के लिए ईमानदारी से काम करेगा, वही जीतेगा-यह बांकीपुर ने साबित कर दिया।

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रामायण में रावण केवल अपनी शक्ति के कारण पराजित नहीं हुआ था। उसके पतन का सबसे बड़ा कारण उसका अहंकार था। उसे विश्वास था कि संसार में कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसने विरोधियों को तुच्छ समझा, शुभचिंतकों की सलाह ठुकराई और अपनी अजेयता को ही सत्य मान लिया। अंततः वही अहंकार उसके साम्राज्य के विनाश का कारण बना।

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लोकतंत्र में भी मतदाता समय-समय पर इसी संदेश को दोहराते रहे हैं कि कोई भी दल या नेता जनता से बड़ा नहीं होता। जब किसी राजनीतिक दल या उसके नेताओं में यह भावना पैदा हो जाती है कि कोई सीट इतनी सुरक्षित है कि वहां किसी भी उम्मीदवार को उतार देने पर जीत तय है, तब यह आत्मविश्वास धीरे-धीरे अहंकार में बदलने लगता है।

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भाजपा के वरिष्ठ नेता का यह चर्चित कथन कि बांकीपुर से भाजपा कुत्ता-बिल्ली को भी उतार दे तो वह चुनाव जीत जाएगा इसी संदर्भ में चर्चा का विषय बना। यदि किसी चुनावी क्षेत्र के मतदाताओं को यह संदेश जाए कि उनकी राय, उम्मीदवार की योग्यता और जनता की अपेक्षाओं का महत्व नहीं है, तो लोकतंत्र में उसका उत्तर मतपेटी से मिलता है।

बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि भाजपा इस सीट पर पराजित हुई है, तो यह केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि कोई भी राजनीतिक गढ़ स्थायी नहीं होता। मतदाता अवसर आने पर सबसे मजबूत समझे जाने वाले किलों को भी ध्वस्त कर सकते हैं।

यह घटना सभी राजनीतिक दलों के लिए एक संदेश है कि संगठन की ताकत, लोकप्रियता और पिछले चुनावों की सफलता महत्वपूर्ण अवश्य है, लेकिन अंतिम निर्णय मतदाता का होता है। लोकतंत्र में विनम्रता, जनभावनाओं का सम्मान और योग्य उम्मीदवार का चयन ही स्थायी राजनीतिक सफलता की आधारशिला हैं।

रावण की कथा हमें यही सिखाती है कि शक्ति का पतन बाहर से पहले भीतर के अहंकार से शुरू होता है। राजनीति में भी जो दल या नेता जनता के निर्णय को हल्के में लेते हैं, उन्हें कभी न कभी मतदाता यह याद दिला देते हैं कि लोकतंत्र में अंतिम सत्ता किसी व्यक्ति या दल की नहीं, बल्कि जनता की होती है।

पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा का मजबूत गढ़ भेद दिया। चुनाव लड़ने का उनका फैसला और मेहनत रंग लाई। भाजपा ने पहले उम्मीदवार बदला, फिर दूसरे प्रत्याशी को मैदान में उतारा, जिसे राजनीतिक विश्लेषक उसकी कमजोरी मान रहे हैं। बांकीपुर के नतीजों की चर्चा अब राष्ट्रीय स्तर पर होगी। भाजपा हार के कारणों की समीक्षा करेगी। पार्टी के कोर वोटरों की नाराजगी और वोटों के खिसकने की चर्चा भी तेज है। विपक्ष को भाजपा के खिलाफ नया मुद्दा मिल गया है।

इस जीत से प्रशांत किशोर को नई राजनीतिक ऊर्जा मिलेगी। लंबे समय से वह बिहार में अपनी पार्टी को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। अब सदन से सड़क तक उनकी सक्रियता बढ़ने की संभावना है। वहीं, इस नतीजे ने बिहार में एनडीए, खासकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की चुनौती भी बढ़ा दी है।

उधर, मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, जहां कांग्रेस के घनश्याम सिंह विजयी रहे। हालांकि, बिहार और मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद इन दोनों उपचुनावों की हार से सरकारों पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। चुनाव में हार-जीत लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।

पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में यदि प्रशांत किशोर ने भाजपा को उसके मजबूत गढ़ में पराजित किया है, तो इसका महत्व केवल एक सीट तक सीमित नहीं है। भारतीय राजनीति में कुछ चुनाव ऐसे होते हैं, जिनका प्रभाव संख्या से अधिक संदेश में छिपा होता है। बांकीपुर का परिणाम भी उसी श्रेणी में रखा जा सकता है।

भाजपा लंबे समय से बांकीपुर को अपने सबसे सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में गिनती रही है। ऐसे में यहां मिली हार पार्टी के लिए आत्ममंथन का विषय होगी। यह संदेश जाएगा कि कोई भी राजनीतिक किला स्थायी नहीं होता। मतदाता यदि बदलाव का मन बना लें तो वर्षों से कायम चुनावी समीकरण भी बदल सकते हैं।

इस परिणाम का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ प्रशांत किशोर को मिलेगा। अब तक उनकी पहचान देश के सफल चुनावी रणनीतिकार के रूप में थी, लेकिन इस जीत के बाद वे एक ऐसे नेता के रूप में उभरेंगे जो अपनी राजनीतिक जमीन भी तैयार कर सकता है। जन सुराज के लिए यह जीत नई ऊर्जा और विश्वसनीयता लेकर आएगी। बिहार की राजनीति में अब उन्हें केवल रणनीतिकार नहीं, बल्कि एक प्रभावी राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाएगा।

भाजपा के लिए यह परिणाम उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक समन्वय पर गंभीर समीक्षा का अवसर बनेगा। यदि पार्टी के पारंपरिक समर्थकों में असंतोष या उदासीनता रही है, तो उसे दूर करना नेतृत्व की प्राथमिकता होगी। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा निश्चित रूप से अपने बूथ प्रबंधन, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक रणनीति की नए सिरे से समीक्षा करेगी।
इस हार का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होगा। विपक्ष को यह कहने का अवसर मिलेगा कि भाजपा को उसके सबसे मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी हराया जा सकता है। इससे विपक्षी दलों और कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा और आगामी चुनावों में मुकाबला अधिक रोचक हो सकता है।

हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि एक उपचुनाव पूरे राज्य की राजनीतिक दिशा तय नहीं करता। इससे न तो सरकार की स्थिरता पर कोई तत्काल प्रभाव पड़ता है और न ही विधानसभा चुनाव के परिणाम का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। लेकिन यह परिणाम इतना अवश्य बताता है कि लोकतंत्र में कोई भी सीट स्थायी रूप से किसी दल की नहीं होती और मतदाता हर चुनाव में नया फैसला देने की क्षमता रखते हैं।

बांकीपुर का संदेश स्पष्ट है—राजनीति में आत्मविश्वास आवश्यक है, लेकिन अति-आत्मविश्वास और अहंकार अक्सर नुकसानदेह साबित होते हैं। जो दल जनता की नब्ज को समझते हैं, स्थानीय नेतृत्व को महत्व देते हैं और मतदाताओं की अपेक्षाओं का सम्मान करते हैं, अंततः वही राजनीतिक बढ़त बनाए रखते हैं। इसलिए यह उपचुनाव केवल प्रशांत किशोर की जीत नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक चेतना का भी संकेत माना जा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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