जनसंवाद, खरसावां (उमाकांत कर)। हरिभंजा में आयोजित रथयात्रा महोत्सव के पांचवें दिन सोमवार रात हेरा पंचमी का पर्व श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। श्रीजगन्नाथ धाम पुरी की परंपरा के अनुरूप आयोजित रथ भंगिनी अनुष्ठान ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। देर रात तक मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी और पूरा क्षेत्र “जय जगन्नाथ” के जयघोष से गूंजता रहा।
हेरा पंचमी के अवसर पर श्री मंदिर परिसर स्थित लक्ष्मी मंदिर से मां महालक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को सुसज्जित पालकी (विमान) में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठानों के बीच शोभायात्रा गुंडिचा मंदिर पहुंची। यहां देवी महालक्ष्मी की पूजा के बाद उन्हें भगवान जगन्नाथ के नंदिघोष रथ तक ले जाया गया, जहां विधि-विधान से पूजा संपन्न हुई।
धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजा के बाद देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा को रथ पर स्थापित कर रथ के पहिये की लकड़ी को प्रतीकात्मक रूप से तोड़ा गया। इस रस्म को रथ भंगिनी कहा जाता है। यह परंपरा उस पौराणिक प्रसंग का प्रतीक है, जिसमें समय पर श्रीमंदिर नहीं लौटने पर देवी महालक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के प्रति अपना मान और नाराजगी व्यक्त करते हुए उनके रथ को प्रतीकात्मक रूप से क्षति पहुंचाती हैं।
अनुष्ठान के दौरान पूरा मंदिर परिसर श्रद्धा और भक्ति के माहौल में डूबा रहा। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस अनूठी धार्मिक परंपरा के दर्शन कर भगवान जगन्नाथ से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
हरिभंजा जगन्नाथ मंदिर के मुख्य सेवक विद्या विनोद सिंहदेव ने बताया कि हेरा पंचमी दांपत्य प्रेम, मान-मनौवल और पारिवारिक भावनाओं का प्रतीक पर्व है। उन्होंने कहा कि हरिभंजा में वर्षों से इस परंपरा का वैदिक विधि-विधान के साथ पालन किया जा रहा है, जो श्रीजगन्नाथ संस्कृति की समृद्ध विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
हेरा पंचमी के आयोजन के साथ ही अब बाहुड़ा रथयात्रा की तैयारियां भी तेज हो गई हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार रथ भंगिनी के तीसरे दिन रथ का दक्षिणामुख संस्कार किया जाएगा। इसके बाद 24 जुलाई को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की बाहुड़ा रथयात्रा निकाली जाएगी। मंदिर समिति और सेवायत इसकी तैयारियों में जुटे हुए हैं।

















