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आदित्यपुर : पत्रकार पर हमले के बाद कार्रवाई का इंतजार, गिरफ्तारी में देरी और थाना परिसर की गतिविधियों पर उठे कई सवाल…

By Balram Panda

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आदित्यपुर / Balram Panda : पत्रकार सुनील कुमार गुप्ता और उनके पुत्र पर हुए हमले के मामले ने अब केवल एक आपराधिक घटना का स्वरूप नहीं रखा है, बल्कि यह पुलिस कार्रवाई, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून व्यवस्था की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, घटना के चार दिन बीत जाने के बावजूद मामले में किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होने से चर्चाओं का बाजार गर्म है.

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पुलिस ने मामले को गंभीर मानते हुए भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की है, इसके बावजूद अब तक गिरफ्तारी नहीं होने से आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर जांच किस दिशा में आगे बढ़ रही है, यदि आरोप इतने गंभीर हैं कि कड़ी धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, तो फिर आरोपियों तक पुलिस के हाथ क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं.

इधर घटना के विरोध में पत्रकार संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है, प्रेस क्लब ऑफ सरायकेला-खरसावां के बैनर तले पत्रकार आदित्यपुर थाना परिसर में धरने पर बैठे हैं और लगातार न्याय की मांग कर रहे हैं, पत्रकारों का कहना है कि यदि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से जुड़े लोगों पर हमले के मामलों में भी त्वरित कार्रवाई नहीं होती है, तो यह एक चिंताजनक संकेत है.

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मामले में एक और पहलू अब चर्चा के केंद्र में आ गया है, आरोपियों के परिजनों और समर्थकों द्वारा आदित्यपुर थाना परिसर में प्रदर्शन और नारेबाजी किए जाने को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं, आमतौर पर थाना परिसर को संवेदनशील प्रशासनिक क्षेत्र माना जाता है, जहां सुरक्षा और कानून व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। ऐसे में यह जानना आवश्यक हो जाता है कि आखिर थाना परिसर में प्रदर्शन और नारेबाजी किसकी अनुमति से की गई.

क्या प्रदर्शनकारियों ने संबंधित थाना प्रशासन को पूर्व सूचना दी थी? क्या किसी सक्षम प्रशासनिक अधिकारी से इसकी अनुमति प्राप्त की गई थी? क्या इसके लिए कोई लिखित आवेदन दिया गया था? यदि अनुमति दी गई थी तो उसके क्या नियम और शर्तें थीं, और यदि अनुमति नहीं थी तो फिर ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए?

इन सवालों के बीच पुलिस और जिला प्रशासन की ओर से अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्थिति सामने नहीं आई है, यही कारण है कि चर्चाओं और अटकलों का दौर लगातार बढ़ रहा है, नागरिकों का मानना है कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक पारदर्शिता बेहद जरूरी है ताकि किसी प्रकार की भ्रम या पक्षपात की स्थिति उत्पन्न न हो.

फिलहाल पूरे मामले में दो बड़े प्रश्न लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं, पहला, पत्रकार पर हमले के आरोपियों की गिरफ्तारी आखिर कब होगी? और दूसरा, थाना परिसर में हुए प्रदर्शन और नारेबाजी की प्रशासनिक वैधता क्या थी? अब सबकी निगाहें पुलिस और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, आने वाले दिनों में उठाए जाने वाले कदम ही यह तय करेंगे कि कानून का संदेश कितना प्रभावी और निष्पक्ष रूप से समाज तक पहुंचता है.

 

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